पूज्य तन सिंह जी द्वारा कच्छ राजपूत सभा के अध्यक्ष को जून 1960 में लिखा गया पत्र जो संघशक्ति के अगस्त 1987 के अंक में प्रकाशित हुआ था।
सीकर
13.6.60
आदरणीय श्री हिम्मतसिंह जी
अध्यक्ष, कच्छ राजपूत सभा
भुज
श्रीमान,
राजस्थान भूस्वामी संघ के अध्यक्ष श्री रघुवीरसिंह जी से मेरी बात हुई थी। कच्छ की समस्या के लिए हम सभी लोग चिंतित हैं। श्री रघुवीरसिंह जी ने गुजरात के राजस्व मंत्री से जो बातचीत की है, उससे समझौते का सद्भावनापूर्ण वातावरण तैयार हुआ है। पर आज ही मुझे रघुवीरसिंह जी ने बताया है कि आपने अभी तक उन्हें कच्छ राजपूत सभा के मन्तव्यों से सूचित नहीं किया है, जिनसे उनके और गुजरात सरकार के बीच वार्ता में गतिरोध उत्पन्न होने के आसार दिखाई दे रहे हैं।
मुझे क्षमा करें, मैं आपके किसी निर्णय पर दबाव नहीं डालना चाहता पर मैं आप से ईमानदारी से कुछ भावनाएं प्रगट करना चाहता हूँ। कच्छ में राजपूत आन्दोलन की स्थिति इस समय बड़ी ही नाजुक है। इस नाजुक स्थिति में आपका सहयोग का हाथ ठुकराना एक ऐतिहासिक भूल हो सकती है। सरकार से पारस्परिक वार्तालाप के सभी अवसरों का धैर्य और विवेक से उपयोग करना चाहिए क्योंकि इस पर कच्छ के असंख्य राजपूतों का भाग्य निर्भर है। मेरा आपको ऐसे उपदेश देना निस्संदेह धृष्टता है, पर मुझे सूचना मिली है कि आप की सभा आन्दोलन में विश्वास ज्यादा करती है, ऐसी सलाह देने वाले राजस्थान के हों अथवा भारत के अन्य किसी हिस्से के हों, हमारा सामूहिक हित नहीं कर रहे हैं। इस समय देश छोड़ो आंदोलन के अंतर्निहित आपकी भावना का अवश्य ही मूल्यांकन करता हूँ पर साथ ही राजनैतिक दृष्टि से उसे विवेक संगत कहने में मुझे हिचकिचाहट ही होगी।
हम लोग राजस्थान से आपको यथाशक्ति आपके निर्णयों को कार्यान्वित करने में मदद देंगे लेकिन आपने यदि आत्महत्या का निर्णय ले लिया हो तो उसमें नम्रता पूर्वक समझाने के हमारे अधिकार को आशा है आप स्वीकार करोगे। संक्षेप में मेरा तो यही निवेदन है कि आप श्री रघुवीरसिंह जी की सेवाओं को न ठुकरावें। सरकार ने जो आखिरी अवसर दिया है उसका उपयोग करें और उपयोग नहीं कर सकें तो श्री रघुवीरसिंह जी की वार्ता के परिणामों की प्रतीक्षा तो अवश्य करें। यदि वे असफल होकर आपको आन्दोलन करने की सलाह देंगे तो आप विश्वास रखिये मैं आपको एक राजपूत का वादा देता हूँ कि आपके आन्दोलन में मैं हजारों प्रथम श्रेणी की योग्यता वाले लोगों सहित सहयोग देने आऊंगा।
आशा है पत्र का बुरा नहीं मानेंगे। श्री रघुवीरसिंह जी को आपके 01.09.60 के सम्मेलन के निर्णयों की सूचना दें और उनकी और सरकार के बीच की बात के लिए उपयुक्त वातावरण तैयार करें। आज जो राजपूतों की उपेक्षा कर राजनैतिक स्वार्थों के कारण उनका शोषण करते हैं, उन्हें एक दिन हमें दिखाना है कि इस देश के लिए राजपूतों की कितनी आवश्यकता है। यह हम तभी दिखा सकते हैं जब ऐसे लोगों से बदला लेते कहीं देश से बदला लेने का अविवेकपूर्ण ऐतिहासिक कलंक न लगा दें। कांग्रेस को महसूस होना चाहिए कि राजपूत सच्चे देशभक्त हैं, वे विश्वासपात्र मित्र तथा उदार और खतरनाक शत्रु होते हैं। विवेक हीन उग्रता पागलपन है पर वही उग्रता विवेक पूर्ण होने पर बहादुरी कहलाती है जो राजपूतों का गुण है। उपदेश देने की आदत से मैं लाचार हूँ, पर आपको उपदेश देने के लिए मैं फिर आपसे क्षमा मांगता हूं।
भवदीय
तनसिंह
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